नई दिल्ली।
देश में साइबर अपराध का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां एक एनआरआई बुजुर्ग दंपति को 18 दिनों तक तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखकर साइबर ठगों ने करीब 14 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। यह ठगी आठ अलग-अलग ट्रांजेक्शन के माध्यम से की गई, जिससे पूरे देश में साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
पीड़ित दंपति को ठगों ने खुद को जांच एजेंसी और कानून प्रवर्तन अधिकारी बताकर फोन किया। आरोपियों ने दावा किया कि दंपति के नाम से मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य गंभीर अपराधों में खाते का इस्तेमाल हुआ है। गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उन्हें लगातार वीडियो कॉल और फोन के जरिए संपर्क में रखा गया, जिसे अब “डिजिटल अरेस्ट” कहा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, ठगों ने दंपति को घर से बाहर न निकलने, किसी से बात न करने और फोन कैमरा हमेशा चालू रखने का दबाव बनाया। इस दौरान उन्हें मानसिक रूप से इस कदर डराया गया कि वे किसी रिश्तेदार या स्थानीय प्रशासन से संपर्क नहीं कर सके। ठगों ने “जांच के लिए पैसे सुरक्षित खाते में जमा कराने” का झांसा देकर 8 किस्तों में 14 करोड़ रुपये ट्रांसफर करवा लिए।
जब लंबे समय तक संपर्क बनाए रखने के बाद भी कोई आधिकारिक नोटिस या दस्तावेज नहीं मिला, तब दंपति को ठगी का शक हुआ। परिजनों को जानकारी देने के बाद साइबर क्राइम सेल में शिकायत दर्ज कराई गई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और बैंक खातों, कॉल डिटेल्स व डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जा रही है।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि “डिजिटल अरेस्ट” साइबर अपराधियों की नई रणनीति बनती जा रही है, जिसमें बुजुर्गों और एनआरआई नागरिकों को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। अधिकारी नागरिकों से अपील कर रहे हैं कि किसी भी जांच एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर पैसे मांगने की स्थिति में तुरंत सतर्क हों और स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें।
यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि डिजिटल युग में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।