Wednesday, March 18, 2026
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‘धुरंधर 2’ से ‘शोले’ तक: सिनेमा में अपराध, सुधार और न्याय की बदलती कहानी – जवाहर नागदेव का विश्लेषण

नागदेव के अनुसार, ‘धुरंधर’ की कहानी एक ऐसे युवक रागी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो परिस्थितियों के चलते अपराध का रास्ता अपनाता है।

by khabariya
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रायपुर। भारतीय सिनेमा में अपराध, न्याय और सुधार की कहानियां हमेशा दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और विश्लेषक जवाहर नागदेव ने अपने विचारों में ‘धुरंधर 2’ से लेकर ‘दो आंखें बारा हाथ’, ‘शोले’ और ‘मोहरा’ जैसी फिल्मों के जरिए इस थीम के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा है।

नागदेव के अनुसार, ‘धुरंधर’ की कहानी एक ऐसे युवक रागी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो परिस्थितियों के चलते अपराध का रास्ता अपनाता है। उसकी पृष्ठभूमि में परिवार पर हुए अत्याचार और न्याय न मिलने की पीड़ा है। यही वजह है कि वह “घायल हूं इसलिए घातक हूं” जैसे संवाद के साथ व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होता है। बाद में ऐसे अपराधियों को समाज के हित में उपयोग करने की अवधारणा सामने आती है।

इसी तरह 1957 की क्लासिक फिल्म ‘दो आंखें बारा हाथ’ का उदाहरण देते हुए नागदेव बताते हैं कि इसमें एक जेलर छह खतरनाक कैदियों को सुधारने का प्रयास करता है। खेती के माध्यम से उन्हें नई जिंदगी दी जाती है और अंततः उनमें मानवीयता का विकास होता है। इस फिल्म का प्रसिद्ध भजन “ऐ मालिक तेरे बंदे हम” आज भी नैतिक मूल्यों की याद दिलाता है।

वहीं ‘खोटे सिक्के’, ‘शोले’ और ‘मोहरा’ जैसी फिल्मों में अपराधियों को बुराई के खिलाफ इस्तेमाल करने की कहानी दिखाई गई है। ‘शोले’ में जहां अपराधियों से डाकुओं का सामना कराया गया, वहीं ‘मोहरा’ में एक सजायाफ्ता व्यक्ति को बड़े अपराधियों के खिलाफ खड़ा किया जाता है, हालांकि उसके पीछे छिपे स्वार्थ भी उजागर होते हैं।

नागदेव का मानना है कि इन सभी फिल्मों में एक बात समान है—“लोहा लोहे को काटता है”। यानी बुराई को खत्म करने के लिए कई बार उसी रास्ते का सहारा लिया जाता है।

यह विश्लेषण दर्शाता है कि भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की जटिलताओं और नैतिक द्वंद्वों को भी गहराई से प्रस्तुत करता है।

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